Thursday, October 29, 2015

* " आदि देव " *


                                                          * " आदि देव " *

आदि का अर्थ है - सर्वप्रथम | मनुष्य के विकास के अनेकों वैज्ञानिक विश्लेषण हैं | विद्वानों ने बताया की बंदरों के क्रमिक विकास से मानव बना | इतिहास बताता है कि मनुष्य प्रारंभ में जंगली जीवों के तरह रहता था ,आगे चलकर आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें ज्ञान की उत्पत्ति हुई | और उसके रहन सहन में क्रमिक विकास होता गया | इतिहासकारों ने पाषाण , मध्यपाषाण एवं नवपाषाण कालों में मानव इतिहास का प्रारंभ कर ,कबीला ,कृषक ,व्यापारी आदि तक का विकास बतलाया | इस क्रम में आगे चलते हुए आज का मानव और उसकी सभ्यता है और ये आगे भी विकसित होती जायेगी | भविष्य मालूम नहीं बल्कि इसी मनुष्यों की जीवनियाँ इतिहास बनती जा रही है | 
मनुष्य के विकास का सच जो भी हो ,हम उसमें जाना नहीं चाहते ,लेकिन एक तथ्य तो हम निर्विवाद रूप से स्वीकार कर सकते हैं की मनुष्य की प्रारंभिक अवस्था में ही उसे आदि मानव की संज्ञा दी है | इन मानवों का अपना जीवन रहा होगा और इनके जीवन में सुख दुःख आते होंगे | सुख दुःख की झंझावातों में उन्हें किसी दृश्य या अदृश्य शक्तियों पर सोचने पर मजबूर किया होगा | सूर्य ,पृथ्वी ,आकाश,जल ,हवा, जानवर ,आदि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया, जिसपर उनका कोई नियंत्रण नहीं था |इसलिए उन्हें ,उनलोगों ने सहायक शक्तियां माना | अपनी सुविधा एवं सुरक्षा के कारण ये सभी समूह में रहना प्रारंभ किये |कंद ,गुफाएं इनके आवास थे| समूहों में रहने के कारण एक शक्तिशाली सदस्य को उनलोगों ने अपना नेता ,मार्गदर्शक या रक्षक माना होगा | उनके जीवन में इन शक्तियों का महत्व हुआ होगा ,जिसको वे सम्मान देते होंगे | आगे चलकर सभी समूहों का एकीकरण हुआ होगा ,जिसको वे सम्मान देते होंगे ,जिनपर सभी सदस्यों को भरोसा रहा होगा | एस एक को एवं इसके समूह के सभी सदस्यों को आदि मानव कहा जा सकता है | 
इतिहास में इसपर बड़े बड़े शोध किये परन्तु सभी शोध तभी प्रमाणिक हुए ,जब उत्खनन कर सभ्यता के इतिहास की क्रमबधता तैयार की जाने लगी अर्थात पुरातत्व का प्रवेश हुआ | पुरातात्विक अवशेषों से ही काल्पनिक अथवा वैज्ञानिक मानवप्रणाली की पुष्टि की गयी और आजतक हम उसी क्रम में चल रहे हैं | इस शृंखला से मानव इतिहास का उद्गम सिन्धु घाटी ,हड़प्पा , मोहनजोदड़ो ,मिस्त्र ,मेसोपोटामिया की सभ्यता का इतिहास उल्लेखित हुआ ,जिसमें देखा गया की मानवके पाषाण युग से लेकर ग्रामीण एवं शहरी जीवन का भी विकास क्रम से हुआ | इससे पूर्व किसी दुसरे सभ्यता का पता पुरातात्विक साक्ष्यों से नहीं किया | इससे मानव के क्रमिक विकास की परिकल्पना को सहारा मिला | 
इन प्राचीन सभ्यताओं में यह साक्ष्य मिला है की वे आदि मानवों ने ईश्वर जैसी कल्पना भी की थी और उनको रूपहीन जानकर मिट्टी की एक खास बनावट (शिवलिंग ) तैयार कर उनकी पूजा करते थे। अर्थात् जल , थल , वायु, सूर्य, चन्द्र, के ऊपर भी एक अदृश्य शक्ति को स्वीकार किये थे, जिन्हें सुख-दुःख का कारक मानते हुए कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास किये जिसका परिणाम है उत्खनन में प्राप्त शिवलिंग। आगे चलकर उनके मस्तिष्क ने उसका मानवीकरण भी करने की में स कोशिश की जिसका परिणाम हुआ पशुपति के रूप में आज के वे शिव। इस पशुपति स्वरुप के साक्ष्य प्राचीन सभ्यताओं में मिले हैं।आज के मंदिरों मे स्थित शिवलिंग उसी की नक़ल है।
इस प्रकार सभ्यता के प्रथम देव आदि देव थे।उस समय न तो जाति थी न धर्म था न क्षेत्र वाद था। जाति, धर्म, स्थान,सम्प्रदाय तो वाद के दिनों की उपज है। आज जिस शिव की पूजा की जाती है वे ही आदि देव थे और उन्हें ही आदि देव माना जाता है। भले ही मध्य से आधुनिक युगों तक सभ्यता के विकास और उसके विस्तार ने मानवों को क्षेत्र, धर्म,सम्प्रदाय आदि में विभक्त कर दिया हो और इसके अनेकों पंथ हो गए हों परन्तु इसमें विवाद का कोई आधार नहीं उपलव्ध है , जिससे यह मानने में अबरोध हो की शिव ही आदि देव थे और आज भी आदि के रूप में स्थापित हैं । किसी ऋषि मुनियों ने, ग्रन्थों ने आदि देव का अर्थ शिव के सिवा किसी दूसरी शक्ति को नहीं माना है।
मानवों की उत्पत्ति के तर्कों में एक तर्क यह भी आता है की स्त्री एवं पुरुष के मेल से मनुष्य ( नर-नारी ) का उद्भव होता है, परन्तु स्त्री एवं पुरूष को उत्पन्न करने वाले कौन थे तो पुनः उत्तर होगा एक स्त्री एवं एक पुरुष । इस शृंखला को जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जाया जाय तो एक स्थिति ठहराव की आती है की होगी कोई सत्ता जिस एक से स्त्री एवं पुरुष का उद्वभव हुआ। अर्थात् एक सत्ता तो होना ही होगा और उस एक सत्ता में स्त्री एवं पुरूष का समन्वित रूप रहा होगा जिसका परिणाम स्त्री, पुरुष एवं आगे आज तक की जनसंख्या । इस से स्पष्ट है कि वह जो सत्ता थी , वह मात्र एक थी जिसके सन्तान पूरी सृष्टि के लोग हैं । इस स्थिति में उस सत्ता को आदि पुरुष, आदि शक्ति कहा ही जायेगा । चूँकि उस सत्ता में विना स्त्री पुरुष के ही सृष्टि उत्पन्न करने की शक्ति थी और मानव वर्ग का वह ही एक ( माता - पिता ) पूर्वज था इसलिए भी उस आदि पुरुष को आदि देव कहा गया जो नाम सिर्फ शिव को प्राप्त है और इसी विज्ञान को प्रदर्शित करता हुआ उनका अर्द्ध नारीश्वर स्वरूप प्रचलित है ।
आदि का अर्थ होता है प्रारम्भिक । जैसे आदि काल, आदि पुरुष, आदि देव, आदि नाम, आदि भौतिक, आदि मूल, आदि। सबों का अर्थ प्रथम या प्रारम्भिक के रूप में लिया जाता है।इस दृष्टिकोण से भी शिव को आदि देव या आदिनाथ कहा गया । बाद के हिन्दू ग्रन्थों। में बहुत से उदाहरण कथाओं के माध्यम से दिए गए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि सभी देवों के प्रथम देव शिव ही थे और उन्हीं को आदि देव कहा गया । तीन देवो "व्रह्मा","विष्णु" और "महेश" की परिकल्पना में "महेश" शिव को कहा गया और उन्हें संहारक शक्ति का मालिक बताया गया। ।उत्पत्ति के मालिक व्रह्मा, स्थिति के विष्णु और पुरे प्रणाली को नष्ट करने के प्रभारी शिव को माना गया। गहराई से चिन्तन करने से यह ज्ञात होगा कि संहार या नष्ट करने की शक्ति उसी को होती है जिसे उत्पन्न और पालन करने की शक्ति होगी । वस्तुतः शिव ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय के कारक हैं।उत्पत्ति,स्थिति और लय तीनों क्रियाएँ शिव ही संचालित करते हैं। इनके तीनों स्वरूपों के मानवीकरण में उत्पत्ति की शक्ति को ब्रह्मा, स्थिति की शक्ति विष्णु एवं संहार करने की शक्ति शिव को देते हुए तीन नाम क्रमशः व्रह्मा,विष्णु और महेश नाम रखे गए लेकिन रहस्य के तौर पर ये तीनों शक्तियों के धारक मात्र शिव हैं।
संहार का अर्थ होता है सब कुछ नष्ट हो जाना यानि शून्य से कुछ सृष्ट होना और फिर संहार की प्रक्रिया से पुनः शुन्य की स्थिति हो जाना। शून्य से सृजन,सृजित का अस्तित्व में रहना और फिर उसका नष्ट हो जाना। इन तीनों प्रक्रियाओं को करने वाली सत्ता स्वयं अक्षुण रही यानि जिसने कुछ सृष्ट किया, रक्खा और समाप्त कर दिया वह अंत में स्वयं तो वच ही गया । पुनः जब उसकी ई च्छा हुई सृजन हुआ उसकी स्थिति रही और फिर वह नष्ट हुआ। इस क्रम के कारक शक्ति शिव को मूल रूप से मन गया। इस चिंतन के आधार पर भी शिव् को आदि देव कहने में कहीं आशंका नहीं रह जाती। महाशून्य इ से प्रथम बार जगत् उत्पन्न हुआ और चल रहा है। समय याज भी आ सकता है जब यह जगत्( सृष्टि ) पूर्णरूपेण संहारित(समाप्त) हो जाय। इसके बाद पुनः महाशून्य की स्थिति हो जायेगी परन्तु वह शक्ति रहेगी। वो शक्ति फिर जब इच्छा करेगी तो जगत् सृष्ट होगा, उसकी इच्छानुसार उनकी ईच्छा तक कायम रहेगा।यद्यपि सृष्टि के प्रथम बार सृष्ट होने के पश्चात् आवश्यकता के अनुसार कई छोटे बड़े सृजन, स्थिति एवं लय की घटना होती रहती है। मनुष्य या पदार्थ जन्म लेता, रह्ता है और फिर नष्ट हो जाता है । चीजें बनती है , रहती है फिर नष्ट हो जाती है, अर्थात् सृष्टि के सृष्ट हो जाने के बाद इस सृष्टि के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की उत्पत्ति,स्थिति अवं लय का क्रम पल-प्रतिपल चलता रहता है और इन सबों के पीछे उसी सृष्टि कर्ता, पालनकर्ता एवं संहारकर्ता शक्ति के धारक आदि देव शिव की इच्छा ही रहती है । इसप्रकार महाशून्य से सृष्टि का प्रथम बार सृष्ट होना उसका चलना और पूर्ण रुपेण उसका विलय हो जाना एक मूल क्रिया है । परन्तु दैनिक जीवन में सृष्टि के विभिन्न आयामों को उत्पन्न होना , रहना और नष्ट होना लघु और लगातार चलने वाली क्रिया है, जो चल रही है । मनुष्य भी अपनी ईच्छा से बहुत सी चीजों को उत्पन्न किया अर्थात् बनाया । उसने जलयान ,वायुयान से लेकर बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्र और आयुध बनाये ,यन्त्र बनाये; उसको चलाते हैं और उसको नष्ट भी करते हैं। यह भी एक प्रकार का वैसा ही कार्य है । परन्तु यह सृष्ट सृष्टि के अन्तर्गत मानव जनित है । आदि देव "शिव" की बात जब होती है तो जगत् के अवतरण से अर्थ लिया जाता है ।
।।।।।इस आलेख के बाद अगले आलेख का इन्तजार कीजिये और अपनी भावना से अबगत कराइये ।।।।।
हेमचन्द्र प्रसाद
शिव-शिष्य

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