Sunday, August 6, 2017

साम्यवादी शिव

   पूर्व में हमने विचार करने की कोशिश की कि शिव ही पूरे व्रह्माण्ड (सृष्टी) की उत्पत्ति एवं लय के कारक हैं और मनुष्य की परिकल्पनाओं की सभी सभी देवी देवताओं में सर्वोच्य स्थान प्राप्त होकर महादेव (देवाधिदेव) के रूप में स्थापित हैं । वे ही ब्रह्म , महाकाल एवं सदाशिव हैं । जब प्रथम बार किसी ऋषि ने इनकी सत्ता एवं सामर्थ्य का अनुभव किया होगा तो वे पाये होंगे कि शिव मूल रूप से एक परम चैतन्य ऊर्जा हैं और शुक्ष्मातिशुक्ष्म है जिसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है । वह ऐसी सर्वशक्तिमान परम ऊर्जा है जिसकी ईच्छा मात्र से ही सब कुछ हो जाता है ।सामान्यतया किसी चीज की उत्पत्ति के लिए प्रथम ईच्छा की जाती है , उसका ज्ञान प्राप्त किया जाता है अवं तदनुरूप क्रिया की जाती है तब जाकर कोई वस्तु निर्मित होती है । मनुष्य भी साधारण रूप से भौतिक सुख सुविधाओं की वस्तुएं सृष्ट की एवं वैज्ञानिक के रूप में उसी तीन क्रियाओं ( ईच्छा, ज्ञान , क्रिया ) के द्वारा बड़े बड़े आविष्कार किये । परन्तु शिव ने जो जगत् सृष्ट किया उन्हें सिर्फ ईच्छा की सोचा और उसी से जगत् प्रोजेक्ट हो गया । इतने शूक्ष्म और परम चैतन्य ऊर्जा को समझने के लिए ऋषियों ने शिव को भौतिक स्वरुप देने का प्रयास किया ।इसमें वे सफल नहीं हुए और अंत में थक हार कर मिट्टी का एक गोला बनाकर कह दिया कि यही शिव हैब । यही एक परिकल्पना शिवलिंग के स्वरूप में युगों युगों से चला आ रहा है जिसका शब्दार्थ ही होता है शिव का प्रतीक यानि जो उस परमात्म शक्ति का चिन्ह होगा जिससे वे जान जायेंगे, पहचाने जायेंगे ।
    अब जब शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ तो उसकी पूजा अथवा उसके प्रति लगाव का क्या माध्यम होगा जिससे सर्वसाधारण उसकी सत्ता को मूर्तरूप में देख सकें और अपनी श्रद्धा उसे दे सके । ऋषियों ने सोचा कि शिव तो सभी के हैं , यदि कोई खास प्रक्रिया बनायी जायेगी तो साधारण पुरुष हो सकता है कि नही कर पाय। ऐसी स्थिति में उनके प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए वताया ह्या की सिर्फ जल चढ़ाया जाय चुकीं जल तो हर कोई चढ़ा सकता है । फिर बेलपत्र, धतूर, भांग आदि चढाने की बात कही गयी जो जंगलों में यूँ ही आसानी से उपलव्ध हो सकते हैं । इसे पैदा करने की जरुरत नही होगी । इसप्रकार शिवलिंग एवं उसकी पूजा का प्रारम्भ हुआ । स्थायी रूप से जल अर्पित हो सके इस हेतु पत्थरों को वह स्वरुप दिया गया और मंदिर आदि बनाये गए । रहस्य तो यह है कि उस परम ऊर्जा का न कोई रूप दिया जा सकता न ही उसे किसी घर ( मन्दिरों) में स्थापित ही किया जा सकता है । वह तो श्रीसृष्टि के कण-कण , अनु, परमाणु में है । परन्तु यह रहस्य सभी  लोग तो समझ नही सकते तो परिणाम में ऋषियों ने शिवलिंग की परिकल्पना दी । यह शिवलिंग विभिन्न कहानियों के साथ विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न रूपों में अवस्थित हैं । उन्हें

Thursday, October 29, 2015

* " आदि देव " *


                                                          * " आदि देव " *

आदि का अर्थ है - सर्वप्रथम | मनुष्य के विकास के अनेकों वैज्ञानिक विश्लेषण हैं | विद्वानों ने बताया की बंदरों के क्रमिक विकास से मानव बना | इतिहास बताता है कि मनुष्य प्रारंभ में जंगली जीवों के तरह रहता था ,आगे चलकर आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें ज्ञान की उत्पत्ति हुई | और उसके रहन सहन में क्रमिक विकास होता गया | इतिहासकारों ने पाषाण , मध्यपाषाण एवं नवपाषाण कालों में मानव इतिहास का प्रारंभ कर ,कबीला ,कृषक ,व्यापारी आदि तक का विकास बतलाया | इस क्रम में आगे चलते हुए आज का मानव और उसकी सभ्यता है और ये आगे भी विकसित होती जायेगी | भविष्य मालूम नहीं बल्कि इसी मनुष्यों की जीवनियाँ इतिहास बनती जा रही है | 
मनुष्य के विकास का सच जो भी हो ,हम उसमें जाना नहीं चाहते ,लेकिन एक तथ्य तो हम निर्विवाद रूप से स्वीकार कर सकते हैं की मनुष्य की प्रारंभिक अवस्था में ही उसे आदि मानव की संज्ञा दी है | इन मानवों का अपना जीवन रहा होगा और इनके जीवन में सुख दुःख आते होंगे | सुख दुःख की झंझावातों में उन्हें किसी दृश्य या अदृश्य शक्तियों पर सोचने पर मजबूर किया होगा | सूर्य ,पृथ्वी ,आकाश,जल ,हवा, जानवर ,आदि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया, जिसपर उनका कोई नियंत्रण नहीं था |इसलिए उन्हें ,उनलोगों ने सहायक शक्तियां माना | अपनी सुविधा एवं सुरक्षा के कारण ये सभी समूह में रहना प्रारंभ किये |कंद ,गुफाएं इनके आवास थे| समूहों में रहने के कारण एक शक्तिशाली सदस्य को उनलोगों ने अपना नेता ,मार्गदर्शक या रक्षक माना होगा | उनके जीवन में इन शक्तियों का महत्व हुआ होगा ,जिसको वे सम्मान देते होंगे | आगे चलकर सभी समूहों का एकीकरण हुआ होगा ,जिसको वे सम्मान देते होंगे ,जिनपर सभी सदस्यों को भरोसा रहा होगा | एस एक को एवं इसके समूह के सभी सदस्यों को आदि मानव कहा जा सकता है | 
इतिहास में इसपर बड़े बड़े शोध किये परन्तु सभी शोध तभी प्रमाणिक हुए ,जब उत्खनन कर सभ्यता के इतिहास की क्रमबधता तैयार की जाने लगी अर्थात पुरातत्व का प्रवेश हुआ | पुरातात्विक अवशेषों से ही काल्पनिक अथवा वैज्ञानिक मानवप्रणाली की पुष्टि की गयी और आजतक हम उसी क्रम में चल रहे हैं | इस शृंखला से मानव इतिहास का उद्गम सिन्धु घाटी ,हड़प्पा , मोहनजोदड़ो ,मिस्त्र ,मेसोपोटामिया की सभ्यता का इतिहास उल्लेखित हुआ ,जिसमें देखा गया की मानवके पाषाण युग से लेकर ग्रामीण एवं शहरी जीवन का भी विकास क्रम से हुआ | इससे पूर्व किसी दुसरे सभ्यता का पता पुरातात्विक साक्ष्यों से नहीं किया | इससे मानव के क्रमिक विकास की परिकल्पना को सहारा मिला | 
इन प्राचीन सभ्यताओं में यह साक्ष्य मिला है की वे आदि मानवों ने ईश्वर जैसी कल्पना भी की थी और उनको रूपहीन जानकर मिट्टी की एक खास बनावट (शिवलिंग ) तैयार कर उनकी पूजा करते थे। अर्थात् जल , थल , वायु, सूर्य, चन्द्र, के ऊपर भी एक अदृश्य शक्ति को स्वीकार किये थे, जिन्हें सुख-दुःख का कारक मानते हुए कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास किये जिसका परिणाम है उत्खनन में प्राप्त शिवलिंग। आगे चलकर उनके मस्तिष्क ने उसका मानवीकरण भी करने की में स कोशिश की जिसका परिणाम हुआ पशुपति के रूप में आज के वे शिव। इस पशुपति स्वरुप के साक्ष्य प्राचीन सभ्यताओं में मिले हैं।आज के मंदिरों मे स्थित शिवलिंग उसी की नक़ल है।
इस प्रकार सभ्यता के प्रथम देव आदि देव थे।उस समय न तो जाति थी न धर्म था न क्षेत्र वाद था। जाति, धर्म, स्थान,सम्प्रदाय तो वाद के दिनों की उपज है। आज जिस शिव की पूजा की जाती है वे ही आदि देव थे और उन्हें ही आदि देव माना जाता है। भले ही मध्य से आधुनिक युगों तक सभ्यता के विकास और उसके विस्तार ने मानवों को क्षेत्र, धर्म,सम्प्रदाय आदि में विभक्त कर दिया हो और इसके अनेकों पंथ हो गए हों परन्तु इसमें विवाद का कोई आधार नहीं उपलव्ध है , जिससे यह मानने में अबरोध हो की शिव ही आदि देव थे और आज भी आदि के रूप में स्थापित हैं । किसी ऋषि मुनियों ने, ग्रन्थों ने आदि देव का अर्थ शिव के सिवा किसी दूसरी शक्ति को नहीं माना है।
मानवों की उत्पत्ति के तर्कों में एक तर्क यह भी आता है की स्त्री एवं पुरुष के मेल से मनुष्य ( नर-नारी ) का उद्भव होता है, परन्तु स्त्री एवं पुरूष को उत्पन्न करने वाले कौन थे तो पुनः उत्तर होगा एक स्त्री एवं एक पुरुष । इस शृंखला को जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जाया जाय तो एक स्थिति ठहराव की आती है की होगी कोई सत्ता जिस एक से स्त्री एवं पुरुष का उद्वभव हुआ। अर्थात् एक सत्ता तो होना ही होगा और उस एक सत्ता में स्त्री एवं पुरूष का समन्वित रूप रहा होगा जिसका परिणाम स्त्री, पुरुष एवं आगे आज तक की जनसंख्या । इस से स्पष्ट है कि वह जो सत्ता थी , वह मात्र एक थी जिसके सन्तान पूरी सृष्टि के लोग हैं । इस स्थिति में उस सत्ता को आदि पुरुष, आदि शक्ति कहा ही जायेगा । चूँकि उस सत्ता में विना स्त्री पुरुष के ही सृष्टि उत्पन्न करने की शक्ति थी और मानव वर्ग का वह ही एक ( माता - पिता ) पूर्वज था इसलिए भी उस आदि पुरुष को आदि देव कहा गया जो नाम सिर्फ शिव को प्राप्त है और इसी विज्ञान को प्रदर्शित करता हुआ उनका अर्द्ध नारीश्वर स्वरूप प्रचलित है ।
आदि का अर्थ होता है प्रारम्भिक । जैसे आदि काल, आदि पुरुष, आदि देव, आदि नाम, आदि भौतिक, आदि मूल, आदि। सबों का अर्थ प्रथम या प्रारम्भिक के रूप में लिया जाता है।इस दृष्टिकोण से भी शिव को आदि देव या आदिनाथ कहा गया । बाद के हिन्दू ग्रन्थों। में बहुत से उदाहरण कथाओं के माध्यम से दिए गए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि सभी देवों के प्रथम देव शिव ही थे और उन्हीं को आदि देव कहा गया । तीन देवो "व्रह्मा","विष्णु" और "महेश" की परिकल्पना में "महेश" शिव को कहा गया और उन्हें संहारक शक्ति का मालिक बताया गया। ।उत्पत्ति के मालिक व्रह्मा, स्थिति के विष्णु और पुरे प्रणाली को नष्ट करने के प्रभारी शिव को माना गया। गहराई से चिन्तन करने से यह ज्ञात होगा कि संहार या नष्ट करने की शक्ति उसी को होती है जिसे उत्पन्न और पालन करने की शक्ति होगी । वस्तुतः शिव ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय के कारक हैं।उत्पत्ति,स्थिति और लय तीनों क्रियाएँ शिव ही संचालित करते हैं। इनके तीनों स्वरूपों के मानवीकरण में उत्पत्ति की शक्ति को ब्रह्मा, स्थिति की शक्ति विष्णु एवं संहार करने की शक्ति शिव को देते हुए तीन नाम क्रमशः व्रह्मा,विष्णु और महेश नाम रखे गए लेकिन रहस्य के तौर पर ये तीनों शक्तियों के धारक मात्र शिव हैं।
संहार का अर्थ होता है सब कुछ नष्ट हो जाना यानि शून्य से कुछ सृष्ट होना और फिर संहार की प्रक्रिया से पुनः शुन्य की स्थिति हो जाना। शून्य से सृजन,सृजित का अस्तित्व में रहना और फिर उसका नष्ट हो जाना। इन तीनों प्रक्रियाओं को करने वाली सत्ता स्वयं अक्षुण रही यानि जिसने कुछ सृष्ट किया, रक्खा और समाप्त कर दिया वह अंत में स्वयं तो वच ही गया । पुनः जब उसकी ई च्छा हुई सृजन हुआ उसकी स्थिति रही और फिर वह नष्ट हुआ। इस क्रम के कारक शक्ति शिव को मूल रूप से मन गया। इस चिंतन के आधार पर भी शिव् को आदि देव कहने में कहीं आशंका नहीं रह जाती। महाशून्य इ से प्रथम बार जगत् उत्पन्न हुआ और चल रहा है। समय याज भी आ सकता है जब यह जगत्( सृष्टि ) पूर्णरूपेण संहारित(समाप्त) हो जाय। इसके बाद पुनः महाशून्य की स्थिति हो जायेगी परन्तु वह शक्ति रहेगी। वो शक्ति फिर जब इच्छा करेगी तो जगत् सृष्ट होगा, उसकी इच्छानुसार उनकी ईच्छा तक कायम रहेगा।यद्यपि सृष्टि के प्रथम बार सृष्ट होने के पश्चात् आवश्यकता के अनुसार कई छोटे बड़े सृजन, स्थिति एवं लय की घटना होती रहती है। मनुष्य या पदार्थ जन्म लेता, रह्ता है और फिर नष्ट हो जाता है । चीजें बनती है , रहती है फिर नष्ट हो जाती है, अर्थात् सृष्टि के सृष्ट हो जाने के बाद इस सृष्टि के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की उत्पत्ति,स्थिति अवं लय का क्रम पल-प्रतिपल चलता रहता है और इन सबों के पीछे उसी सृष्टि कर्ता, पालनकर्ता एवं संहारकर्ता शक्ति के धारक आदि देव शिव की इच्छा ही रहती है । इसप्रकार महाशून्य से सृष्टि का प्रथम बार सृष्ट होना उसका चलना और पूर्ण रुपेण उसका विलय हो जाना एक मूल क्रिया है । परन्तु दैनिक जीवन में सृष्टि के विभिन्न आयामों को उत्पन्न होना , रहना और नष्ट होना लघु और लगातार चलने वाली क्रिया है, जो चल रही है । मनुष्य भी अपनी ईच्छा से बहुत सी चीजों को उत्पन्न किया अर्थात् बनाया । उसने जलयान ,वायुयान से लेकर बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्र और आयुध बनाये ,यन्त्र बनाये; उसको चलाते हैं और उसको नष्ट भी करते हैं। यह भी एक प्रकार का वैसा ही कार्य है । परन्तु यह सृष्ट सृष्टि के अन्तर्गत मानव जनित है । आदि देव "शिव" की बात जब होती है तो जगत् के अवतरण से अर्थ लिया जाता है ।
।।।।।इस आलेख के बाद अगले आलेख का इन्तजार कीजिये और अपनी भावना से अबगत कराइये ।।।।।
हेमचन्द्र प्रसाद
शिव-शिष्य

Sunday, October 25, 2015

योगिराज शिव

                                                                                                             
                         योगिराज शिव   
      योग का अभिलेखीय सूत्रपात पतंजलि योग से मिलता है । आगे चलकर योग के बहुत प्रकार हुये यथा:--भक्तियोग, प्रेमयोग, लययोग, नादयोग, ध्यानयोग, तंत्रयोग, क्रियायोग आदि आदि । हरेक योगों के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की गयी, मोक्ष पाये गए । उसके अलग- अलग संत,मुनि, ऋषि एवं गुरु होते रहे और अपने- अपने योग मार्ग की सर्वोच्चता स्थापित करते रहे । आज भी योग की कई विधाएँ हमारी जानकारियों में व्याप्त हैं । जिसे जिसमे मन लगता है वह उस विधा में जाने को स्वतंत्र है ।
                इन सभी योगों का जब अध्ययन किया जाता है तो एक ही सार प्रकट होता है -- वGह है जीवात्मा को परमात्मा दे मिलाना अर्थात् जीव का व्रह्म हो जाना । जिस मूल आत्मा से जीवात्मा का आविर्भाव हुआ उस जीवात्मा को पुनः मूल सत्ता यानि मूल आत्मा ( परमात्मा ) में विलीन हो जाना । कहने का तात्पर्य है कि सभी योगों की यात्रा यानि प्रक्रियायों का अंतिम परिणाम है जीव का व्रह्म से एकमेक हो जाना । सभी योगों के मालिक उसके सदगुरु होते हैं जो खास योग की विधा से शिष्यों का मार्गदर्शन कर अंतिम परिणति तक पहुचाते हैं ।
       हैम पीछे चर्चा कर आये हैं  कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय इन तीनो के मालिक स्वभाविकतः शिव हैं । इस सृष्टि की उत्पत्ति ही शिव की ईच्छा से हुई है । जब सृष्टि नहीँ थी समय ( काल ) नही था तब भी मात्र शिव थे । अर्थात् सृष्टी के पूर्व की महाशून्यता में भी शिव की उपस्थिति थी । शिव महाशून्य में भी थे तब ही तो अपनी मौज से ( ईच्छा ) से सृष्टि की की , जगत् की उत्पत्ति हुई, चराचर बना , सभी जीव-जंतु बने , रंग विरंगी दुनिया बनी, सुख-दुःख , छोटे- वड़े मानव, अमानव आदि आदि सृष्ट हुए और इस सृष्टि का क्रम पल- प्रतिपल चलता आ रहा है, चलता जा रहा है और चलता जाता रहेगा और इन सभी का आधार उनकी ईच्छा ( मौज ) है ।
              जैसे ही परमात्मा से जीवात्मा सृष्ट होगी तो यही कहा जायेगा कि परमात्मा शिव थे जिनका विस्तार जीवात्मा है और संहारक शक्ति शिव के ही पास है । संहार का अर्थ है पूरी दुनिया ( सृष्टि ) का समाप्त हो जाना अर्थात् पुनः महाशून्य की स्थिति आ जानी ।जब ऐसा होगा तो संसाररूपी अनेकात्माओं का विस्तार पुनः सिमट कर एक शिव में एकाकार हो जायेगा । हम देखते हैं कि उत्पत्ति, स्थिति एवं लय ( संहार ) का क्रम हर पल चल रहा है । जीव उत्पन्न हो रहे हैं , चल रहे हैं फिर समाप्त हो रहे हैं । पूर्ण रूप से समाप्त होने के पूर्व यह क्रम पल-प्रतिपल चलता आ रहा है और न जाने कव तक चलता रहेगा । इस चलने के क्रम में ही जीवात्मा का परमात्मा से योग कराने की बात चलती है और सारे योगों का अस्तित्व देखने में आ रहा है । इस बीच के योगों की प्रक्रिया जिसे हम जीवात्मा का परमात्मा से एकमेक होने का विचार करते हैं वहां मूल रूप से शिव ही जीवात्मा हैं और पुनः शिव ही अपनी ईच्छा से अपने विस्तार ( जीवात्मा ) को समेट कर जीवात्मा से स्वयं परमात्मा शिव हो जाते हैं ।इन सभी योगों की प्रक्रियाएँ जो हो , लयकीन जो घटना घटित होती है वह है - जीवन- मरण से जीव की मुक्ति की, उसके मूल कारक शिव ही हैं इसलिए योग की सफलता के मूल कारण भी शिव ही हैं । वही शिव, योग की सारी विधाओं के जनक और परिणाम भी हैं ।
       ऐसे भी हैम देखते हैं कि हर योग में एक सदगुरु होते हैं । देवताओं के जो गुरु माने गए हैं वृहस्पति , उनके गुरु हैं शिव । इसी प्रकार दानवों के गुरु माने गए हैं शुक्राचार्य, इनके भी गुरु शिव हैं । इसप्रकार सभी योग के सभी गुरु के दादा गुरु शिव ही हैं ।तंत्र या योग को किसी विधा के इतिहास पर शुक्ष्म ध्यान देने से स्पष्ट होता है कि सभी योग के सदगुरुओं के मूल गुरु , शिव हैं । ऊपर के वर्णन से हमें मानना होगा कि सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय की शक्ति धारित करने के कारण जीवन मुक्ति के सभी प्रक्रियाओं के मूल में शिव को ही रहना पड़ेगा , दूसरे किसी की शक्ति में नही रह पायेगी ; रह भी नही सकती ~ बहरहाल कल्पना करना ही व्यर्थ होगा । हठ योग, तंत्र योग, अघोर योग आदि जितने भी प्रकार के तंत्र एवं योग हैं , सभी आधाररूपी शक्ति ( मोक्षदाता ) शिव को ही मानते हैं । जब सृष्टि एवं उसका कण-कण शिव की ईच्छा से सृष्ट होगा तब मनुष्य असुर, ज्ञान, अज्ञान सबों की उत्पत्ति के मूल कारण तो शिव ही होंगे फिर योग में जब ज्ञान की बात होगी, मुक्ति की बात होगी तो इसको भी सम्पन्न करना तो शिव को ही पड़ेगा ।ऋषियों ने अनेकों जगह इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि सभी योगो के जनक और उसके परिणाम के कारक मात्र शिव ही हैं ।
        पूर्व में हम विचार कर आये हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति के शुभारम्भ में जो प्रथम पुरुष हुआ वे शिव थे जिन्हें आदि देव कहा गया।
            इस प्रकार शिव को महायोगी क्या योगीराज कहना हमारी विवशता है । इसके अतिरिक्त जो कुछ भी हम विचार करेंगे वह गलत होगा ।
            वस्तुतः शिव की ईच्छा विस्तार से सृष्ट सृष्टि के प्रारम्भ में एक ही सत्ता ( परमात्मा ) थी, इसलिए सृष्टि का प्रथम पुरुष अथवा आदि पुरुष शिव ही थे जो आगे चलकर आदि देव कहलाए । इस शिव में ईच्छा शक्ति इतनी शक्तिशाली थी कि सिर्फ ईच्छा की गयी और सृष्टि प्रोजेक्ट हो गया । जिसने मात्र अपनी ईच्छा से उतने बड़े एवं जटिल सृष्टि ( जगत् ) का निर्माण किया, इस जटिलता को दूर करने का ज्ञान भी उसी ईच्छा धारी को होगा । जब भी उस सृष्टि को अपने में समेटने की ईच्छा करेगा तो वह ईच्छा भी उसी को करना होगा । अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति एवं लय के ज्ञान का मालिक एक मात्र वही शक्ति ( शिव ) होंगे । एक छोटे से उदहारण से समझने का प्रयास किया जा सकता है । माना जाय कि टेलीविजन यंत्र का अविष्कार हुआ । एक पहला व्यक्ति होगा जिसे ईच्छा हुई होगी, ज्ञान हुआ होगा और क्रियाओं के द्वारा टेलीविजन का निर्माण किया होगा । एक प्रथम व्यक्ति तो होगा ही होगा और वही प्रथम व्यक्ति टेलीविजन के निर्माण, मरम्मत्ति, नष्ट करने एवं पुनर्निर्माण का ज्ञान धारित किया होगा ।बाद में उनसे ज्ञान पाकर जो भी निर्माता बन जाय परन्तु पहला वैज्ञानिक यानि आदि वैज्ञानिक तो एक होगा और उसे ही इस यंत्र की उत्पत्ति, स्थिति, लय एवं पुनर्निर्माण का ज्ञान होगा ।इसी प्रकार इस जगत् की सृष्टि निर्माण एवं लयकर्ता प्रथम सत्ता शिव हैं ।इसलिए जब भी उत्पत्ति, स्थिति एवं लय के क्रम में किसी जीवात्मा की वापसी मूल परमात्मा में करने की बात होगी तो उसी प्रक्रिया एवं उसके निष्पादन का प्रथम ज्ञान तो शिव के पास ही होगा । योग का अर्थ ही है परमात्मा से मिलन ( योग ) कराना । यह कार्य जब किसी प्रथम जीवात्मा के साथ किया गया होगा तो यह कार्य शिव को ही करना पड़ा होगा इसमें संदेह नहीं । इसप्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम योग और प्रथम योगगुरु आदिपुरुष , आदि देव , आदि गुरु शिव ही होंगे ।
                सभ्यता के विकास के साथ अध्यात्म का भी विकास हुआ । विकास शब्द तो उपयुक्त नही है यहाँ पर, चूँकि विकास के क्रम से आगे चलता है , लेकिन अध्यात्म के साथ विकास शब्द का प्रयोग सही अर्थ में नही किया जा सकता परन्तु शब्दों का सहारा अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य हो जाता है और कभी-कभी किसी अभिव्यक्ति को सही रूप से अभिव्यक्त करने के लिए सही शब्द उपलव्ध नही हो पाते । फिर भी समझने के ख्याल से हैम विकास शब्द का प्रयोग करते हैं । मूल रूप से जीवात्मा का परमात्मा से मिलन का आधार प्रेम माना गया है चूँकि परमात्मा से निकली सत्ता आत्मा को परमात्मा से ही प्यार होगा । प्रकृति की स्थिति के क्रम में जीवात्मा कर्म करने की स्वतंत्रता को प्राप्त कर मूल सत्ता को भूल जाती है और यही से योग की ( आत्मा से परमात्मा का मिलन में )  कठिनाई प्रारम्भ हो जाती है ।
          जीवात्मा का कर्ता भाव परमात्मा से मिलन में बाधक हो जाता है । यही जीवात्मा जब बार - बार  जन्म लेने के वाद थकती है तो परमात्मा शिव की ईच्छा (दया ) से अपने मूल स्वरुप को ढूंढती है । ढूंढने की प्रक्रिया योग की प्रक्रिया हो जाती है।  प्रक्रिया के कारण ही योग के प्रकार बन जाते हैं । प्रकार अलग-अलग होने के कारण उसके सदगुरु भी अलग-अलग हो जाते हैं अर्थात् सभी प्रकारों के जन्मदाता शिव ही विभिन्न प्रकार के योग के नियामक होने के कारण शरीर में आकर विभिन्न सदगुरुओं के रूप में अवतरित होते हैं ।
        सभी प्रकारों के योगों का शुक्ष्म अध्ययन करने से यह स्पष्ट होगा कि योग की प्रक्रियाएँ जीव को शिव नही बनती वल्कि प्रक्रियाएँ ये  समझाती है कि जीव का कर्ता भाव मिथ्या है । प्रक्रियाएँ जीवात्मा को थका देती है, हरा देती है और जीवात्मा यह समझने की स्थिति में आती है कि वह मूल कर्ता नहीँ वल्कि मूल कर्ता तो परमात्मा शिव हैं । वो तो एक उपकरण मात्र है जिसका संचालन कर्ता परमात्मा शिव स्वयं हैं । बिना उनकी ईच्छा(दया) के मोक्ष (वापसी ) नही हो सकती । इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए हैम एक दो योग की प्रकिया पर विचार करते हैं ।
              कुण्डलनी योग का मूल सिद्धान्त है कि मनुष्य के शरीर में सात चक्र होते हैं --मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, आहत, अनाहत, आज्ञाचक्र एवं सहस्त्रार । कहा जाता है कि व्यक्ति के शरीर के निचले भाग ( गुदा मार्ग और शिष्न के मध्य ) में शिव की वह शक्ति यानि जीवात्मा, सुसुप्तावस्था में रहती है । यह कुण्डलनी शक्ति जब तक अपने मूल सत्ता ( सहस्त्रार में स्थित शिव ) को भूली रहती है तब तक वह जीव भाव में रहती है । हठ योग की प्रक्रिया में इस मूलाधार में स्थित सुसुप्त कुण्डलनी को जगाया जाता है ।जब यह शक्ति जगती है तो यह क्रम से सभी चक्रों को पार करती हुई सहस्त्रार में स्थित शिव से मिलती है और एकाकार हो जाती है । हैम इसकी प्रक्रियाओं की गहनता में नही जाना चाहते लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जब कुण्डलनी शक्ति जगती है तो उसे उर्धमुखी करने में सदगुरु की दया की जरुरत होती है । यदि सद्गुरु नही रहे तो यह जगी शक्ति साधक के लिए खतरनाक हो जाती है। हर चक्रों के जगने और उसे ऊपर की ओर अग्रसर करने में गुरु की परम आवश्यक्ता होती है ।इसीलिए हठ योग को तलवार पर चलने जैसा बताया गया है।
             इस प्रकार राजयोग, ध्यान योगादि में सीधे आज्ञाचक्र को जगाने की प्रक्रिया की जाती है । इस क्षेत्र में यह मन जाता है कि मूलाधार से चलने की प्रक्रिया सर्वसुलभ नही है, सभी जनों के लिए साध्य नही है इसलिये इस योग में ध्यान की प्रक्रियाओं से आज्ञाचक्र को जगा कर सहस्त्रार तक पंहुचा जाता है। यहाँ भी आज्ञाचक्र के जगने के वाद शक्ति को उर्धगामी बनाने के लिए सदगुरु की दया की आवश्यकता होती होती है अन्यथा यहाँ से भी साधक् को नीचे गिरने का खतरा बना रहता है । इसीप्रकार हर योग की अपनी प्रक्रिया है परन्तु सभी का लक्ष्य और मंजिल एक ही है जीवात्मा को जीव भाव से मुक्त कर परमात्मा से योग करा देना । इन योगों में सदगुरु की दया (ईच्छा) ही सर्वोपरि होती है । ये सदगुरु शिव के ही प्रतिनिधि (शिव) होते हैं ।
               इन प्रक्रियाओं के मूल में जाने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवात्मा, जीवात्मा तभी तक रहता है जव तक वह जीव भाव में हो, कर्ता भाव में हो । मनुष्य को भी ईच्छा करने की स्वतंत्रता है , ज्ञान प्राप्त कर क्रिया करने को भी स्वतंत्र है इसी कारण से जीव का कर्ता भाव उसे जीवात्मा बनाये रखती है ।मनुष्य को यदि बता दिया जाय कि इस प्रक्रिया को करने से ईश्वर की प्राप्ति होगी तो उसे प्रतीत होता है कि वह प्रक्रिया कर ईश्वर को प्राप्त कर लेगा, लेकिन जब प्रक्रियाओं में ईमानदारी पूर्वक जाता है और उम्र बीतते जाता है ,क्षमता घटते जाती है तब अंतिम में वह समझने लगता है कि जितना करना था कर लिया अब वह कुछ न कर सकेगा, वैसी स्थिति में वह अपने गुरु पर समर्पित हो जाता है यानि उसका कर्ता भाव समाप्त हो जाता है । अंत में गुरु/सदगुरु दया करते हैं जिससे जीव शिव हो जाता है ।
               इन सारे उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी योगों के सदगुरु या मालिक या मूल कर्ता शिव ही हैं । इसीलिए शिव को योगों का राजा अर्थात् योगिराज कहा गया है जो शास्वत सत्य है ।
                     हेमचन्द्र प्रसाद (शिव-शिष्य)

           

Wednesday, October 21, 2015

शिव आज भी operative गुरु हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें अपना गुरु बना सकता है । चाहे किसी धर्म, सम्प्रदाय, स्थान या लिंग का हो, बस मनुष्य होना चाहए । कहावत है कि "हाथ कंगन को आरसी क्या" कोई भी इस तथ्य को जाँच सकता है उन्हें अपना गुरु बना कर ।