पूर्व में हमने विचार करने की कोशिश की कि शिव ही पूरे व्रह्माण्ड (सृष्टी) की उत्पत्ति एवं लय के कारक हैं और मनुष्य की परिकल्पनाओं की सभी सभी देवी देवताओं में सर्वोच्य स्थान प्राप्त होकर महादेव (देवाधिदेव) के रूप में स्थापित हैं । वे ही ब्रह्म , महाकाल एवं सदाशिव हैं । जब प्रथम बार किसी ऋषि ने इनकी सत्ता एवं सामर्थ्य का अनुभव किया होगा तो वे पाये होंगे कि शिव मूल रूप से एक परम चैतन्य ऊर्जा हैं और शुक्ष्मातिशुक्ष्म है जिसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है । वह ऐसी सर्वशक्तिमान परम ऊर्जा है जिसकी ईच्छा मात्र से ही सब कुछ हो जाता है ।सामान्यतया किसी चीज की उत्पत्ति के लिए प्रथम ईच्छा की जाती है , उसका ज्ञान प्राप्त किया जाता है अवं तदनुरूप क्रिया की जाती है तब जाकर कोई वस्तु निर्मित होती है । मनुष्य भी साधारण रूप से भौतिक सुख सुविधाओं की वस्तुएं सृष्ट की एवं वैज्ञानिक के रूप में उसी तीन क्रियाओं ( ईच्छा, ज्ञान , क्रिया ) के द्वारा बड़े बड़े आविष्कार किये । परन्तु शिव ने जो जगत् सृष्ट किया उन्हें सिर्फ ईच्छा की सोचा और उसी से जगत् प्रोजेक्ट हो गया । इतने शूक्ष्म और परम चैतन्य ऊर्जा को समझने के लिए ऋषियों ने शिव को भौतिक स्वरुप देने का प्रयास किया ।इसमें वे सफल नहीं हुए और अंत में थक हार कर मिट्टी का एक गोला बनाकर कह दिया कि यही शिव हैब । यही एक परिकल्पना शिवलिंग के स्वरूप में युगों युगों से चला आ रहा है जिसका शब्दार्थ ही होता है शिव का प्रतीक यानि जो उस परमात्म शक्ति का चिन्ह होगा जिससे वे जान जायेंगे, पहचाने जायेंगे ।
अब जब शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ तो उसकी पूजा अथवा उसके प्रति लगाव का क्या माध्यम होगा जिससे सर्वसाधारण उसकी सत्ता को मूर्तरूप में देख सकें और अपनी श्रद्धा उसे दे सके । ऋषियों ने सोचा कि शिव तो सभी के हैं , यदि कोई खास प्रक्रिया बनायी जायेगी तो साधारण पुरुष हो सकता है कि नही कर पाय। ऐसी स्थिति में उनके प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए वताया ह्या की सिर्फ जल चढ़ाया जाय चुकीं जल तो हर कोई चढ़ा सकता है । फिर बेलपत्र, धतूर, भांग आदि चढाने की बात कही गयी जो जंगलों में यूँ ही आसानी से उपलव्ध हो सकते हैं । इसे पैदा करने की जरुरत नही होगी । इसप्रकार शिवलिंग एवं उसकी पूजा का प्रारम्भ हुआ । स्थायी रूप से जल अर्पित हो सके इस हेतु पत्थरों को वह स्वरुप दिया गया और मंदिर आदि बनाये गए । रहस्य तो यह है कि उस परम ऊर्जा का न कोई रूप दिया जा सकता न ही उसे किसी घर ( मन्दिरों) में स्थापित ही किया जा सकता है । वह तो श्रीसृष्टि के कण-कण , अनु, परमाणु में है । परन्तु यह रहस्य सभी लोग तो समझ नही सकते तो परिणाम में ऋषियों ने शिवलिंग की परिकल्पना दी । यह शिवलिंग विभिन्न कहानियों के साथ विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न रूपों में अवस्थित हैं । उन्हें
अब जब शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ तो उसकी पूजा अथवा उसके प्रति लगाव का क्या माध्यम होगा जिससे सर्वसाधारण उसकी सत्ता को मूर्तरूप में देख सकें और अपनी श्रद्धा उसे दे सके । ऋषियों ने सोचा कि शिव तो सभी के हैं , यदि कोई खास प्रक्रिया बनायी जायेगी तो साधारण पुरुष हो सकता है कि नही कर पाय। ऐसी स्थिति में उनके प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए वताया ह्या की सिर्फ जल चढ़ाया जाय चुकीं जल तो हर कोई चढ़ा सकता है । फिर बेलपत्र, धतूर, भांग आदि चढाने की बात कही गयी जो जंगलों में यूँ ही आसानी से उपलव्ध हो सकते हैं । इसे पैदा करने की जरुरत नही होगी । इसप्रकार शिवलिंग एवं उसकी पूजा का प्रारम्भ हुआ । स्थायी रूप से जल अर्पित हो सके इस हेतु पत्थरों को वह स्वरुप दिया गया और मंदिर आदि बनाये गए । रहस्य तो यह है कि उस परम ऊर्जा का न कोई रूप दिया जा सकता न ही उसे किसी घर ( मन्दिरों) में स्थापित ही किया जा सकता है । वह तो श्रीसृष्टि के कण-कण , अनु, परमाणु में है । परन्तु यह रहस्य सभी लोग तो समझ नही सकते तो परिणाम में ऋषियों ने शिवलिंग की परिकल्पना दी । यह शिवलिंग विभिन्न कहानियों के साथ विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न रूपों में अवस्थित हैं । उन्हें